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मेरठ मस्जिद के पास जबरन हनुमान चालीसा पढ़ने के दो आरोपियों की जमानत मंजूर

-सचिन सिरोही और संजय समरवाल को मार्च में किया गया था गिरफ्तार
-मेरठ पुलिस ने बीएनएस की विभिन्न धाराओं में केस दर्ज किया था

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अखिल भारतीय हिंदू सुरक्षा समिति के एक नेता सहित दो लोगों को मेरठ मस्जिद के पास जबरन हनुमान चालीसा पाठ करने के मामले में जमानत मंजूर कर ली है। यह आदेश न्यायमूर्ति राजबीर सिंह की पीठ ने सचिन सिरोही और संजय समरवाल की जमानत याचिका पर सुनवाई के बाद दिया है।
आरोपियों को इस वर्ष मार्च में मेरठ में एक मस्जिद के पास जबरन हनुमान चालीसा पढ़ने के लिए गिरफ्तार किया गया था। सचिन सिरोही और संजय समरवाल के खिलाफ मेरठ पुलिस ने बीएनएस की धारा 191 (2) दंगा, 196 ( विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना व सद्भाव बनाए रखने के लिए हानिकारक कार्य करना) और 197 (राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक आरोप, दावे) के तहत मामला दर्ज किया है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार आरोपियों ने अपने साथियों के साथ एक मस्जिद के बाहर विरोध प्रदर्शन किया, धर्म विरोधी नारे लगाए और उसके बाद मस्जिद के पास हनुमान चालीसा का पाठ किया। इससे धर्म के आधार पर दुश्मनी और नफरत को बढ़ावा मिला। उन पर मस्जिद को गिराने की धमकी देने का भी आरोप है, जिसके कारण क्षेत्र में अफरातफरी मच गई और रेलवे स्टेशन की ओर जा रहे लोगों में तनाव पैदा हो गया।
जमानत की मांग करते हुए आरोपियों के अधिवक्ता ने कहा कि दोनों के खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह झूठे हैं और दावा किया कि उन्हें राजनीतिक कारणों से इस मामले में फंसाया गया है। यह भी तर्क दिया गया कि एफआईआर की विषयवस्तु और गवाहों के बयान याचियों के खिलाफ कोई विश्वसनीय साक्ष्य नहीं देते हैं इसलिए उन्हें जमानत दी जाए।
दूसरी ओर सरकारी वकील ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि सद्भाव बिगाड़ने के लिए याचियों ने एक धार्मिक स्थल पर हनुमान चालीसा का पाठ किया और इस तरह धर्म के आधार पर दुश्मनी को बढ़ावा दिया। सुनवाई के बाद कोर्ट ने कहा कि आरोप की गंभीरता या उसके समर्थन में सामग्री की उपलब्धता ही जमानत देने से इनकार करने के लिए एकमात्र आधार नहीं हैं। यह अच्छी तरह से स्थापित है कि दोषसिद्धि से पहले के चरण में निर्दोषता की धारणा होती है। किसी व्यक्ति को हिरासत में रखने का उद्देश्य मुकदमे का सामना करने और दी जाने वाली सज़ा को भुगतने के लिए उसकी उपलब्धता सुनिश्चित करना है। हिरासत को दंडात्मक या निवारक नहीं माना जाता है।

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